डॉ। राजेन्द्र प्रसाद(Dr. Rajendra Prasad)

 

(Dr. Rajendra Prasad)डॉ। राजेन्द्र प्रसाद 
    डॉराजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर सन 1884
 28 फरवरी को हुआ था। यह भारत के पहले राष्ट्रपति थे। और दो बार राष्ट्रपति चुने गए थे। इनका शब्द सन 1952 से सन 1957 तक और सन् 1957 से सन 1962 तक रहा।उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। डॉ। राजेंद्र प्रसाद की मृत्यु 28 फरवरी सन 1963 को हुई।

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यह कहानी डॉ। राजेंद्र प्रसाद के सीधी और सरल स्वभाव की है

        सुबह का समय था। गंजजन नल से एक बालटी पानी भरता हुआ उसे लेकर भवन की ओर दौड़ता ।इस बीच नल के नीचे रखी बालटी भर जाती है ।वह उसे उठाता और लेकर दौड़ा दौड़ा भीतर जाता ।तभी कंधे पर अंगोछा डाले हाथ में धोती और लोटा लिए एक व्यक्ति वहाँ आ गया। ।

       वह बोला – “भाई जरा बाल्टी दे दो। हम भी नहा ले।”

           “आपको क्या जल्दी है? कुछ देर रुक जाओ। अभी हमें भीतर पानी पहुंचाना है” गज़्जन ने कहा ।

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 “बस एक बाल्टी दे दो झट से दो चार लोटे डालेंगे।” उस व्यक्ति ने कहा। अरे! तुम समझते हो क्यों नहीं! आज सभा है। भीतर बड़े-बड़े लोग जमा हैं। उनके स्नान के लिए हर कमरे में पानी पहुंचाना है। देर मत करवाओ। “गज्जन ने बाल्टी लेकर जाते हुए कहा।

     

 “अच्छा! लाओ हम भी मदद कर देते हैं।” वह व्यक्ति बोला।

     

उस व्यक्ति ने धोती की गर्दन पर डाली, लोटा रखा और बालटी भरते ही, दौड़ दौड़कर गज्जन को पकड़ाने लगे। थोड़ी देर में सभी कमरों में पानी पहुंच गया। गज्जन बैठकर सुस्ताने लगा । व्यक्ति ने झटपट स्नान किया और गज्जन को धन्यवाद देकर वहां से चला गया।

           

 थोड़ी देर में सभा शुरू हुई स्वयंसेवक नेताओं को शरबत के गिलास परोस रहे थे। गज्जन उत्साह से सबको गिलास पकड़ा जा रहा था। उसके सामने बैठे व्यक्तित गिलास पकड़या, तो हक्का-बक्का रह गया, “अरे यह तो वही हैं। जिन्हें मैंने बालटी नहीं दी थी।

 

              गज्जन को हक्का-बक्का देखकर मदन मोहन मालवीय जी बोले, “वे नहीं जानते होंगे, भाई! यह राजेंद्र बाबू है।” गज्जन ने राजेंद्र बाबू के पैर पकड़ लिए और माफी मांगने लगा। राजेंद्र बाबू मुस्कुराए और गज्जन को गले से लगा लिया।

            

 सादगी के पुजारी यह राजेंद्र बाबू हमारे पहले राष्ट्रपति बने। राष्ट्रपति भवन में रहने पर भी उनके रहने-ठहरने में कोई अंतर नहीं आया। वे एक साधारण किसान की तरह ही जीवन बिताते रहे और देश की सेवा करते रहे।

इस कहानी से हमें सीखना चाहिए कि अपने जीवन में हमें सदा उच्च विचार रखने चाहिए।

(Dr. Rajendra Prasad)

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