सिंहासन बत्तीसी | विक्रमादित्य की कहानी

                   सिंहासन बत्तीसी 

          सिंहासन बत्तीसी  महाराज सम्राट विक्रमादित्य के जीवन के विषय में बताती है। वह बहुत ही न्याय प्रिय, त्यागी और महादानी थे।यह कहानी उनके सिंहासन में जड़ी बतीस पुतलियों की है। जिन्होंने राजा भोज को सुनाई थी।

             बहुत समय पहले की बात है ।जब राजा भोज उज्जैन के राजा थे वह बहुत ही न्याय प्रिय राजा थे। उनके शासनकाल में प्रजा बहुत ही सुखी और संपन्न थी। उज्जैन नगर में मिट्टी का बर्तन बनाने वाले कुम्हारो की एक बस्ती थी ।उज्जैन नगर के कुम्हार द्वारा बनाए गए बर्तन बहुत दूर-दूर राज्यों तक बिकते थे। उनके बनाए गए बर्तन बहुत ही सुंदर होते थे।
 
                   कुम्हारों की बस्ती में एक गडरिया भी रहता था ।जिसका नाम सूरजभान था ।सूरजभान के घर के पास उसका एक मित्र रहता था दोनों में बड़ी अच्छी दोस्ती थी ।लेकिन एक बच्चे को लेकर दोनों में झगड़ा हुआ करता था ।सूरजभान अपने दोस्त के प्रति सहानुभूति रखता था। और वह इस दुश्मनी को दोस्ती में बदलना चाहता था। दोनों की दोस्ती को देखकर उन्हीं केेे बस्ती में रहने वाला एक व्यक्ति बहुत ईर्ष्या करता था।वह उनकी दोस्ती तुड़वाना चाहता था। 
             
सिंहासन बत्तीसी   सूरजभान और उसका दोस्त दोनों ही मेहनती और ताकतवर थे ।दोनों गांव के आसपास के लोगों की जानवर चराया करते थे।एक दिन जब एक कुम्हार मिट्टी का बर्तन बनाने के लिए मिट्टी खोद रहा था। तब उसे मिट्टी खोदते समय  ग्रहस्थी के सामान मिले ।
यह खबर चारों ओर फैल गई सभी यह कहते थे कि कभी वहां महल हुआ करता था। जो किसी भयानक भूकंप की वजह से खत्म हो गया।लोग मिट्टी की खुदाई करते।  और उसमें जो सामान मिलता उसे उठा ले जाते।
        
             सूरजभान का एक लड़का था जिसका नाम चंद्रभान था ।वह भी मेहनती और ईमानदार था। वह लोगों से कहता की मिट्टी की खुदाई में जो सामान मिल रहा है उस पर सबका बराबर का हक है। इसलिए उसे जो भी सामान खुदाई में मिलता वह सबको बराबर बांट देता।
          चंद्रभान एक समझदार व्यक्ति था जो लोगों की समस्याओं को सुनता और उनका सही फैसला लेता।उसके इसी स्वभाव से लोग उसकी तारीफ करते और अपनी समस्या लेकर उसके पास जाते ।एक बार कुछ लोगों की बातें सुनकर उसने कहा वह राजा किस काम का जो मुसीबत आने पर काम आए।
राजा वह जो मुसीबत आने से पहले उसका हल निकाले। उसकी यह बात सुनकर लोग डर गए। कि अगर यह बात राजा भोज तक पहुंची तो उनके सिपाही उन्हें पकड़ ले जाएंगे।
          
सिंहासन बत्तीसी  आखिरकार यह खबर राजा भोज तक पहुंच गई। राजा ने अपने सिपाही को आदेश दिया कि जो भी फरियादी चंद्रभान के पास जाता है। उसे राजदरबार लाया जाए एक दिन दरबार में एक व्यापारी आया राजा के सामने उसने अपनी फरियाद रखी। उसने कहा कि महाराज में व्यापार के काम से एक जगह से दूसरी जगह जाता रहता हूं ।
इस बार जब मैं व्यापार के लिए दूसरे नगर जा रहा था। तो मेरे पास कुछ बहुमूल्य हीरे जवाहरात थे।जो मैंने अपने दूसरे व्यापारी मित्र को सुरक्षित रखने के लिए दिए थे और उससे कहा कि जब मैं वापस आऊंगा तब मुझे दे देना ।किंतु अब वह मुझे देने से साफ इनकार कर रहा है ।
           
             राजा भोज ने फिर दूसरे व्यापारी को राज दरबार में बुलाया और उससे पूछा कि क्या इस व्यापारी ने तुम्हारे पास अपने हीरे जवाहरात सुरक्षित रखने के लिए दिए थे।दूसरे व्यापारी ने कहा हां महाराज मुझे दिए थे। किंतु उनके आने के बाद मैंने इनकी सारी वस्तुएं इन्हें लौटा दी और अब यह मुझसे दोबारा अपनी वस्तुएं मांग रहे हैं। 
             
              राजा भोज ने दूसरे व्यापारी से पूछा कि क्या तुम्हारे पास कोई गवाह है।तुमने इस व्यापारी की चीजें इन्हें वापस कर दी ।व्यापारी ने कहा हां मंदिर के पुजारी और गांव की मुखिया के सामने मैंने इनकी चीजें वापस लौटा दी थी। राज दरबार में उन्हें बुलाया गया।
            
             मंदिर के पुजारी और गांव के मुखिया दरबार में आए। और राजा भोज के सामने उन्होंने कहा हां महाराज चीजें वापस कर दी थी। राजा भोज पहले व्यापारी पर क्रोधित हुए। और उसे सजा सुनाने की बात कही। इस पर उस व्यापारी ने रोते हुए कहा कि अगर मै चन्द्रभान के पास जाता तो मुझे न्याय अवश्य मिलता।
             राजा भोज ने बोला ठीक है मैं भी चन्द्रभान का न्याय देखना चाहता हूं।
     

सिंहासन बत्तीसी   राजा भोज भेष बदलकर व्यापारी के साथ चंद्रभान के पास गए उन्होंने देखा की चंद्रभान कुछ लोगों के साथ एक ऊंचे से टीले पर बैठा हुआ है।

व्यापारी चंद्रभान के पास गया और अपनी सारी बात बताई चंद्रभान ने मंदिर के पुजारी और गांव के मुखिया को बुलाया और उनसे पूछा कि तुम लोगों ने सामान वापस करते हुए देखा।

उन्होंने कहा हां हमने देखा फिर चंद्रभान ने उनसे पूछा तो बताओ कौन कौन सी वस्तु थी जो व्यापारी ने वापस की ।

              यह सुनते ही मंदिर के पुजारी और मुखिया घबरा गए उनके पास कोई जवाब नहीं था ।उन्होंने कहा कि उन्होंने सिर्फ एक पोटली देखी थी।

चंद्रभान ने डांटते हुए कह। तुम्हें कितना धन इस व्यापारी ने झूठ बोलने के लिए दिए। व्यापारी ने घबराकर चन्द्रभान के पैर पकड़ लिए और क्षमा मांगने लगा। राजा भोज उठे और चन्द्रभान की तारीफ की और कहा कि तुम अनपढ़ और गंवार हो फिर तुमने कैसे इतना सही फैसला सुनाया

 
                     चंद्रभान राजा भोज को देखकर खड़ा हुआ ।और हाथ जोड़ते हुए कहा ।पता नहीं इस टीले पर बैठते ही मुझ में कैसे हिम्मत आ जाती है। मैं कैसे इन सब को इंसाफ दे देता हूं मुझे नहीं पता ।
तब राजा भोज ने उस टीले की खुदाई की वह देखना चाहते थे कि आखिर इस टीले के नीचे क्या है जो चंद्रभान जैसा इंसान बैठकर भी इतना सही इंसाफ करता है?टीले की खुदाई में एक सिंहासन मिला जिसमें बत्तीस पुतलियां जड़ी हुई थी।

              बत्तीस पुतलियों से जड़ा सिंहासन राजमहल लाया गया ।उसकी सफाई हुई वह फिर चमकने लगा ।राजा भोज ने सिंहासन को देखा सिंहासन के चारों तरफ पुतलियां जड़ी हुई थी मानोअभी बोल पड़ेगी ।

उसे देखा और उनकी इच्छा हुई कि वह उस पर बैठे। वह जैसे ही सिंहासन के पास गए इतने में ही एक पुतली निकली और उसने राजा भोज से कहा। क्या तुम विक्रमादित्य जैसे दानी, न्याय प्रिय हो?यह सुनकर राजा भोज आश्चर्य  चकित  हो गए।

            उस पहली पुतली का नाम रतन मंजरी था ।जिसने राजा भोज से कहा कि यदि तुम विक्रमादित्य जैसे ज्ञानी , त्यागी और महान हो तभी तुम इस सिंहासन पर बैठ सकते हो।

राजा भोज ने पुतली से पूछा की इस कहानी का सिंहासन से । क्या मतलब है ।पहली पुतली रतनमंजरी ने कहा इस कहाानी से आप विक्रमादित्यय  को समझ पाओगेे।

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