Vikram betal ki kahani hindi Me विक्रम वेताल की कहानी

 

   Vikram betal in Hindi

कहानी रंजावती की दुविधा

Vikram vetal Story in hindi
Vikram betal story in hindi

 

Vikram Betal Story in Hindi

राजा विक्रमादित्य जैसे ही बेताल के प्रश्न का सही उत्तर देते बेताल उनके कंधे से उड़कर पीपल के पेड़ पर लटक जाता। इस कहानी में भी ऐसा ही हुआ।

   राजा विक्रमादित्य ने पीपल के वृक्ष पर चढ़कर बेताल को उतारा और अपने कंधे पर डालकर आगे चलने लगे । राजा विक्रमादित्य के चलते ही बेताल ने अपनी कहानी सुनाना शुरू की।

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बिंदु शेखर नाम का एक धनी व्यापारी मगध की राजधानी में रहता था। उसकी एक संतान थी जिसका नाम राजशेखर था।वह बड़े ही शान शौकत से रहता था।

राजशेखर के बचपन का एक मित्र था जिसका नाम अविरूप था। दोनों में बहुत ही गहरी मित्रता थी। यदि कोई अनजान उन्हें देखता तो वह दोनों को सगा भाई समझता।

एक दिन दोनों नदी किनारे घूमने गए। वहां दुर्गा मां के मंदिर में राजशेखर ने एक लड़की को देखा। देखते ही वह अपना दिल हार गया और उससे प्रेम करने लगा।अविरूप ने बताया कि उस लड़की का नाम रंजावती है। और वह उससे प्रेम करता था। रंजावती धोबी जाति की थी।

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अब वे लोग रोज मिलने लगे।अविरूप ने राजशेखर से कहा कि उसे अपने मन की बात माता-पिता को बता देनी चाहिए।
राजशेखर ने उदास मन से कहा कि उसे पता है कि इस रिश्ते के लिए वह लोग नहीं मानेंगे अपने से नीची जाति के लड़की को कभी नहीं स्वीकार करेंगे।
Vikram Betal Story in Hindi

दोनों मिलते गए और दोनों का प्रेम गहरा होता गया।अब धीरे-धीरे राजशेखर का बिना रंजावती के रहना असहनीय हो गया था। एक दिन राजशेखर माता दुर्गा के चरणों में गिरकर यह प्रतिज्ञा लेता है ।की वह रजांवती से विवाह करना चाहता है ।इसलिए वह पूर्णिमा के दिन अपना सिर काट कर उनके चरणों में अर्पित कर देगा।
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राजशेखर पर जैसे जुनून सवार हो गया था उसने खाना पीना सब कुछ छोड़ दिया। वह कमजोर हो गया उसके माता-पिता को उसकी चिंता होने लगी ।आखिरकार एक दिन अविरूप ने उन्हें बताया कि राजशेखर को रंजावती  से प्रेम हो गया है। परंतु वह बिना आपकी सहमति के उससे विवाह नहीं कर सकता।
 

बिंदु शेखर के माता पिता पुत्र वियोग के डर से उन्होंने राजशेखर का विवाह रंजावती से कर दिया। दोनों प्रसन्नता पूर्वक रहने लगे एक दिन राजशेखर ,अभिरूप और रंजावती नदी के किनारे घूम रहे थे ।

जहां उसने रंजावती को पहली बार देखा था। तभी उसे अपनी प्रतिज्ञा याद आ गई। और वह पूर्णिमा की प्रतीक्षा करने लगा ।पूर्णिमा के दिन वह मंदिर गया और हाथ जोड़कर देवी माता से प्रार्थना की और उनका आशीर्वाद लेकर उसने तलवार से अपना सिर काट दिया।

राजशेखर के वापस न लौटने पर उसकी पत्नी परेशान हुई ।उस ने अविरूप से कहा कि वह राजशेखर को ढूंढे कि वह कहां है।अविरूप मंदिर गया और उसने देखा की राजशेखर का सर कटा हुआ है। वह बहुत दुखी हुआ उसने सोचा यदि मैं जा कर यह बात सब से कहूंगा तो लोग सोचेंगे कि मैंने उसकी सुंदर पत्नी को प्राप्त करने की इच्छा से उसे मार डाला। इसलिए उसने खुद को माता के चरणों में अर्पित कर दिया और उसने भी अपना सिर काट डाला।

 रंजावती दोनों को ढूंढते हुए खुद मंदिर की ओर गई मंदिर पहुंचने पर उसने देखा खून से लथपथ दोनों के कटे हुए सिर देखते ही वह घबरा गई । और दुर्गा मां से बोली अब मेरा जीवन किस काम का उसने भी तलवार उठा कर अपना सिर अलग करना चाहा ।

किंतु एक तेजपुंज के साथ माता खुद प्रकट हुई और उन्होंने उससे कहा ।में इन दोनों लोगों के बलिदान से बहुत ही प्रसन्न हूं तुम अपना अंत मत करो तुम जैसे ही इन दोनों का सिर लगाओगी मैं इन्हें जीवन दान दे दूंगी।

 इतना कह कर माता दुर्गा अंतर्ध्यान हो गई खुशी से भरी हुई। रंजावती ने दोनों सिरों को धड़ से मिला दिया पर भावना के अतिरेक में उसने राजशेखर के सिर को अभिरूप के शरीर पर और अभिरूप के सिर को राजशेखर के शरीर पर लगा दिया।
 

 बेताल ने  राजा विक्रमादित्य से कहा तुम्हें क्या लगता है। रंजावती को किसे अपना पति स्वीकार करना चाहिए।
विक्रमादित्य कुछ देर चुप रहे और फिर बोले राजशेखर के सिर वाला शरीर रंजावती को चुनना चाहिए। क्योंकि सिर शरीर की मुख्य हिस्सा है। और उसी से मनुष्य के व्यक्तित्व एवं चरित्र की पहचान होती है ।

बेताल जानता था कि महाराजा विक्रमादित्य सही उत्तर देंगे और उनका उत्तर सुनते ही वह उनके कंधे से उड़कर फिर पीपल के पेड़ पर जाकर लटक गया। इस तरह से Vikram Betel story in hindi की कहानी खत्म हुई।

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