बच्चों की नैतिक कहानियां Hindi kahani शिक्षाप्रद कहानी

                         बचपन की आदतें    

Hindi Stories for kids  कपिल अपने परिवार में बहुत लाड़ला था। मां-बाप उसकी सभी जिद पूरी करते थे ।इसीलिए वह जिद्दी हो गया था। हर काम वह लालच दिखाने पर ही करता था स्कूल की तैयारी के लिए उसे टाफियों का लालच दिया जाता था।
 
 पढ़ने के लिए बैठने से पूर्व अपनी मां से चॉकलेट पाने का वचन लेता था ।सुबह जब उसकी स्कूल की तैयारी होती थी, तब पूरे घर में भागदौड़ मच जाती थी, किताबे बैग में रखना इधर उधर से ढूंढ कर जूते मोजे लाना। पेन कहीं तो पेंसिल कहीं पड़ी होती थी। मतलब यह कि उसकी मां और बहन उसकी तैयारी में सहायता करते थे।
 
 जबकि कपिल स्वयं टॉफियों का रट लगाना आरंभ कर देता था। इसके पहले उसे जगाने में ,तथा हाथ मुंह धो लेने में या फिर दांतों में ब्रश कराने तथा नहाने व कपड़े पहनाने में पूरे परिवार को बड़ा परिश्रम करना पड़ता था ।
 
मां-बाप समझते थे कि बड़ा होने पर उसमें अच्छी आदतें अपने आप आ जाएंगी।
 
 आरंभ से कपिल को मां बाप से बड़ा लाड प्यार मिला। कभी उसे डांटा नहीं गया। जरा सा उदास होने पर माता-पिता उसे प्रसन्न करने की कोशिश में लग जाते थे ।इसी कारण से कपिल का नासमझ मन अपने आप को बहुत श्रेष्ठ समझने लगा था।
 
 विद्यालय में साथियों के बीच अपने को ऊंचा समझना तथा अध्यापकों की डांट का बुरा मानना जैसे अवगुण भी उसमें आ गए थे। विद्यालय से लौटकर बैग फेंक देना ,जूते उतार कर इधर-उधर डाल देना ,विद्यालय की वर्दी उचित ढंग से न टांगना, जहां बैठकर पढ़ना कापियां, पेन वह पेंसिल वहीं छोड़ देना उसकी सामान्य आदते थी ।भोजन में यह नहीं खाऊंगा ,वह नहीं खाऊंगा ,या फिर आंसू बहा कर खाना उसका प्रतिदिन का नियम था मां-बाप भी उसके कार्यों से उब गए थे। अब उन्हें चिंता होने लगी थी कि आखिर कपिल सुधरेगा कैसे।
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 उसी वर्ष कपिल की बुआ जी दशहरे के अवकाश में उनके यहां आई हुई थी ।बुआ जी के साथ उनका पुत्र गौरव भी था। उसकी उम्र कपिल की उम्र के बराबर थी और वह भी उसी कक्षा में पढ़ता था जिसमें कपिल पढ़ता था।ओ गौरव अपने साथ पुस्तके भी लाया था ताकि छुट्टियों में वह पढ़ता लिखता भी रहे ।
कपिल को घर में एक साथी पाकर बड़ी प्रसन्नता हुई, वे दोनों साथ साथ खाते, खेलते और सोते थे ।रात में कपिल कॉमिक्स पढंता और गौरव को भी पढ़ने के लिए देता। किंतु गौरव थोड़ी देर तक ही कॉमिक्स पढंता और ठीक समय पर सो जाता था ।कपिल अकेले ही देर रात तक व्यर्थ की पुस्तके पढ़ता रहता था। और उसे गौरव का जल्दी सोने का क्रम जरा भी अच्छा नहीं लगता था।
 
प्रांत:काल जब कपिल जबरदस्ती जाकर बिठाया जाता ।तो देखता कि गौरव नहा धोकर कपड़े पहने बैठा पढ़ रहा होता था। गौरव प्रतिदिन कपिल से कहता तुम प्रातः काल उठते में बहुत देर करते हो। कपिल देखो मैं तुम्हारे साथ नाश्ता करने के लिए कितनी देर से बैठा हूं ।कपिल को बुरा भी लगता था और लज्जा भी आती थी। वह भी नहा धोकर तैयार होता और फिर दोनों साथ साथ नाश्ता करते।
 
 कपिल देखता कि विद्यालय में छुट्टियां हैं फिर भी गौरव नित्य एक निश्चित समय पढ़ने में लगाता था। घर में पहनने वाले कपड़े और बाहर के लिए कपड़े व स्वयं किस प्रकार उचित ढंग से टॉगता था। उसमें अपने जूते चप्पल एक निश्चित स्थान पर ही रखने की आदत थी। नाश्ते का भोजन में जो भी उसके सामने आ जाता था बड़े प्रेम से खाता था। वह कभी उदास नहीं होता था हमेशा प्रसन्न चित्त रहता था।
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 सायंकाल इधर-उधर समय काटने की वजह वह कपिल के साथ लेकर कुछ दूर टहलने जाता था। उसे खुले में सूर्यास्त से देखना बहुत पसंद था। अपने प्रत्येक काम में गौरव अपने मां से कम से कम सहायता लेता था। वह किसी वस्तु को पाने की जिद भी नहीं करता था। कपिल ने सोचा कि क्या बुआ जी अपने बेटे को प्रेम नहीं करती हैं। उसने एक दिन उनसे पूछ ही लिया। बुआ जी! आप गौरव से दूर दूर क्यों रहते हैं। उस बेचारे को अपना सब काम स्वयं करना पड़ता है। क्या आप उसे प्यार नहीं करती?
 
 बुआ जी ने कहा ,बेटा कपिल, गौरव तो मेरी आंखों का तारा है। मैं उसे बहुत प्रेम करती हूं, उतना ही जितना तुम्हारी मां तुम्हें करती है ।लेकिन मैंने उसे अपना काम स्वयं करने की शिक्षा दी है मैंने उसे सदा अच्छी आदतें अपनाने का सुझाव दिया ।अच्छी आदतें डलवाई भी हैं। बचपन से ही जो बच्चे अच्छी आदतें डाल लेती मैं बड़े होकर उन्नति भी करते हैं और सुखी भी रहते हैं।
 
 कपिल तो वैसे भी धीरे-धीरे गौरव कि तरह बनने का प्रयत्न कर रहा था। बुआ जी की बातों का उस पर बड़ा असर धीरे-धीरे कपिल में सुधार आ गया। और उसने गौरव की सभी अच्छी आदतों को अपना लिया। बुआ जी व गौरव चले गए किंतु गौरव कपिल पर एक अमिट छाप छोड़ गया ।
 
शिक्षा 
जोो   बच्चे बचपन से ही अच्छी आदतों का पालन करते हैं उन्हें जीवन में हमेशा सफलता प्राप्त होती है तथा उन्हें सभी पसंद करते हैं।
 
बच्चों की शिक्षाप्रद कहानियां  
                        सभी भेद खुल जाते हैं।  
Hindi stories for kids एक रूसी बालक ने एक दिन अपनी मां को यह कहते सुना,”भेद सदा खुल जाते हैं।”रात में उसने मां से पूछा,” मां! भेद सदा खुल जाते है- इसका क्या अर्थ है?”मां ने उत्तर दिया,” यदि कोई व्यक्ति गलत काम करता है, तो वह उसे कितना भी छिपाए ,एक ना एक दिन लोगों को उसका पता चल ही जाता है।” और तब उसे बहुत शर्मिंदा होना पड़ता है। मां का उत्तर सुनकर बालक सोने चला गया।
 अगले दिन वह प्रातः काल उठा और तैयार होकर नाश्ता करने बैठा। मां प्लेट में सूजी की खीर ले आई और बोली,” लो बेटा,खीर खाओ ।”बालक को सूजी की खीर अच्छी नहीं लगती थी। उसने मां से कहा,”यह तो मेरे गले से नीचे ही नहीं उतरती।” मां बालक के पास बैठ गई और दुलार से बोली,” क्रेमलिन चलना चाहते हो ?”क्रेमलिन बालक को बहुत प्रिय था ।उससे सुंदर जगह उसने कहीं नहीं देखी थी ।उसने कहा,” जरूर मां! मैं अवश्य चलूंगा।” मां मुस्कुराई और बोली चलना है तो जल्दी से खीर समाप्त कर दो।
 इतने में मै रसोई का काम निपटा लेती हो।” मां रसोई घर में चली गई ।बालक ने खीर चखी, उसे खीर बिल्कुल अच्छी नहीं लगी। उसने उसमें चीनी मिलाई। फिर खाने की कोशिश की वह खीर को मुंह में डालता किंतु वह गले से नीचे ना उतरती उसे क्रेमलिन जाना था इसके लिए उसे खीर की प्लेट खाली करनी थी उसने मन ही मन कुछ सोचा और थोड़ी ही देर में उसने सारी खेल खिड़की से बाहर फेंक दी तथा खाली प्लेट लिए कुर्सी पर बैठ गया।
 तभी मां कमरे में आई और प्रसन्नता से बोली वह बेटा तुमने तो सारी प्लेट ही खाली कर दी वह चुप रहा किंतु उसने स्वीकृत में गर्दन हिला दी। मां उस बालक को साथ लेकर क्रेमलिन के लिए चलने ही वाली थी। तभी दरवाजे की घंटी बजी मां ने बढ़कर दरवाजा खोला एक सिपाही अंदर आया। नमस्ते कह कर वह सिपाही कमरे की खिड़की के पास गया, और बोला आप लोग सभ्य लगते हो ।तो जूठन गली में फेंकते हैं, बड़ी शर्म की बात है, मैंने पूछा -क्या बात है? आप ऐसा क्यों कह रहे हैं। सिपाही ने अपने दूसरे साथी को आवाज दी। दूसरा सिपाही भी अंदर आ गया उसे देखते ही बालक समझ गया कि अब क्रेमलिन जाना संभव नहीं। सिपाही के सिर पर टोप था और टोप पर खीर बिखरी हुई थी। थोड़ी सी उसके कलर के पीछे कंधे पर, और बाएं जूते पर भी गिर गई थी।
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मां ने बालक पर नजर डाली वह सब कुछ समझ गई उसे बहुत गुस्सा आ रहा था। उसने उस सिपाहियों से कहा ,”मैं क्षमा मांगती हूं लाइए, मैं आपके कपड़े साफ कर देती हूं।”किंतु दोनों सिपाही क्रोधित होते हुए कमरे से बाहर चले गए। जब मां दरवाजे के पास से लौटीं तो बालक भय से कांप रहा था। फिर भी वह मां के पास गया और बोला,”मां! मुझे क्षमा कर दो ।फिर कभी ऐसी गलती नहीं करूंगा ।आपने ठीक ही कहा था कि भेद सदा खुल जाते हैं।”
 मां ने उसकी ओर देखा और पूछा,”तुम्हें यह बात हमेशा याद रहेगी न?”  ” हां” कहते हुए बालक ने सिर झुका लिया। वह अपने किए पर बहुत लज्जित था
  
लोग गलत काम छुपकर इसलिए करते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि उनका वह काम गलत है और लोग उनके काम को पसंद नहीं करेंगे। उनके उस काम से लोगों की नजर में बुरा बन जाएंगे, किंतु भेद छिपे नहीं रहते, खुल ही जाते हैं।

 

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