ashvatthaama kaun tha| अश्वत्थामा आज भी जिंदा है

 ashvatthama Kaun tha

Asashvatthama Kaun tha   कहां जाता है कि अश्वत्थामा आज भी जिंदा है ।महाभारत के किस्से का एक अद्भुत अंग जिसके विषय में बहुत कम लोग जानते हैं। आज भी लोगों का मानना है कि वह अपने जख्मों के साथ दिखाई देता है ।अश्वत्थामा एक प्रबल योद्धा होने के बाद भी उसे ऐसा कौन सा जख्म दिया गया कि आज तक वह भरा नहीं महाभारत में ऐसा क्या हुआ कि अश्वत्थामा को मौत भी नसीब नहीं हुई ।उसे अपने जख्मों के साथ आज भी दरबदर की तकलीफ झेलनी पड रही हैं। तो चलिए जानते हैं कि Asashvatthama Kaun tha

 

who is ashvatthama कौन थे अश्वत्थामा

अश्वत्थामा गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र थे जो बहुत ही वीर और पराक्रमी है ।कहा जाता है कि जब वह पैदा हुए थे। तो उनके गले से घोड़े की तरह हिन- हिनने की आवाज आती थी। उनके गले से आने वाली आवाज के वजह से उनका नाम अश्वत्थामा पड़ा।

अश्वत्थामा का जब जन्म हुआ था, तभी उनके माथे पर एक अमूल्य मणि जुड़ा हुआ था। अश्वत्थामा के उस मणि में इतनी शक्ति थी कि वह अश्वत्थामा को देवता असुर सबसे बचाकर रखती थी। वह मणि इतनी अमुल्य थी कि देवता और असुरों उसे कोई भी हरा नहीं सकता था। यह कुछ अदभुत बातें अश्वत्थामा की।

महाभारत युद्ध Ashwathama

अब चलते हैं जानने की आखिरी महाभारत के युद्ध में अश्वत्थामा के साथ ऐसा क्या हुआ कि आज भी लोग कहते हैं कि वह जिंदा है ।उन्हें श्राप लगा है कि कलयुग खत्म होने तक उन्हें इसी सृष्टि पर इनहीं जख्मों के साथ ही रहना है। तो चलिए जानते हैं कि आखिर अश्वत्थामा को श्राप किसने दिया क्यों दिया।

अश्वत्थामा महाभारत के वक्त एक ऐसा प्रबल योद्धा जिसका नाम हमें महाभारत के योद्धाओं मे नही मिलता,आपने अर्जुन,भीम,कर्ण, दुर्योधन आदि के नाम सुने परन्तु अश्वत्थामा ऐसा योद्धा था कि उसने पांडवों को लगभग पराजित कर दिया था। लेकिन तभी पांण्डवों की हार को देखते हुए पांण्डवों ने एक ऐसी चाल चली कि  पांडवों की जीत तय हो गई ।

आपको जानकार यह आश्चर्य होगा कि वह चाल चलने वाला और कोई नहीं भगवान श्री कृष्ण थे क्योंकि उन्हें पता था कि उस दिन युद्ध में कौरवों की तरफ गुरु द्रोणाचार्य और उनके शिष्य दोनों युद्ध लड़ रहे थे।

जैसा कि हमें पता है कि गुरु द्रोणाचार्य वही शख्स थे जिन्होंने कौरव और पांडव दोनों को युद्ध विद्या शास्त्र सिखाये थे ।और श्रीकृष्ण जानते थे कि गुरु द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा को हराना बहुत मुश्किल है ।दोनों ही वीरयोद्धा थे,उन्हें पता था कि गुरु द्रोणाचार्य को रोकना बहुत ही कठिन है। इसलिए उन्होंने एक चाल चली वह चाल थी अश्वत्थामा नाम की एक हाथी की

उस दिन कौरव की खेमे में एक हाथी भी युद्ध लड़ रहा था। और उस हाथी का नाम भी अश्वत्थामा था।

श्री कृष्ण ने भीम की तरफ इशारा किया कि वह उस हाथी को मार गिराये।भीम कि एक गदे की चोट से ही हाथी धरती पर गिरा और उसकी मृत्यु हो गई ।उसकी मृत्यु होते श्री कृष्ण ने आवाज लगाई कि अश्वत्थामा मारा गया युधिष्ठिर ने जैसे ही सुना कि अश्वत्थामा मारा गया उन्होंने द्रोणाचार्य की तरफ आवाज लगाई थी अश्वत्थामा मारा गया। द्रोणाचार्य ने जैसे ही सुना कि अश्वत्थामा मारा गया वह रथ से नीचे उतर गए और नीचे जमीन पर बैठकर विलाप करने लगे ।पांडवों के पास यही मौका था गुरु द्रोणाचार्य को मारने का और उन्होंने वही किया उनके खेमे में मौजूद सैनिक मिलकर द्रोणाचार्य की गर्दन को उनके शरीर से अलग कर दिया।

 

यह सुनकर अश्वत्थामा कि उनके पिता गुरु द्रोणाचार्य को पांडवों ने मार दिया तो वह क्रोधित हो उठे ।और इस छल का बदला लेने के लिए उसने रात के समय पांडवों के खेमे में घुसकर द्रोपदी के सोते हुए पांचों पुत्रों का वध कर दिया।
यह देखकर अर्जुन क्रोधित हो जाते हैं। और अश्वत्थामा का पीछा किया अश्वत्थामा ने जब देखा कि अर्जुन आज उसे नहीं छोड़ेंगे तो उसने बिना सोचे समझे ब्रह्मास्त्र चला दिया। लेकिन जब उसे इस बात का एहसास हुआ कि उसने यह गलत किया तो उसे अपने किए पर पछतावा होता है। लेकिन अफसोस उसे ब्रह्मास्त्र चलाना तो आता था पर उसे लौटना नहीं आता था। उसका चलाया गए ब्रह्मास्त्र जाकर अभिमन्यु की पत्नी के गर्भ में लगता है। जिससे उसकी और उसके गर्भ में पल रहे शिशु की मृत्यु हो जाती है।

इस घटना से श्री कृष्ण अति क्रोधित हो जाते हैं और वे अश्वत्थामा के माथे पर लगी हुई उसके मणि निकाल लेते हैं ।जिससे अश्वत्थामा की सारी शक्ति खत्म हो जाती है श्री कृष्ण क्रोधित होते हुए उसे श्राप देते हैं कि कलयुग के अंत तक तुम्हारा सामना मौत से कभी नहीं होगा तुम ऐसे ही कलयुग के अंत तक  भटकते रहोगे तुम्हें मौत भी नसीब नहीं होगी। यह श्राप था या अमर होने का वरदान यह तो अश्वत्थामा ही जान किंतु आज भी लोगों का मानना है कि अश्वत्थामा जिंदा है ।

Ashvatthama still Alive 2021

मध्यप्रदेश के बुरहानपुर से बीस किलोमीटर दूर असीरगढ़ नाम का एक किला मौजूद है ।जो अपने अंदर न जाने कितने राज छिपाए बैठा है ।इस किले के अंदर एक महादेव का मंदिर है जिसे लोग गुप्तेश्वर मंदिर के नाम से जानते हैं। वहां पर रहने वाले लोगों का मानना है कि अश्वत्थामा वहां रोज आते हैं और शिव की पूजा करके चले जाते हैं ।किंतु उन्हें किसी ने आते नहीं देखा लोगों का कहना है कि अश्वत्थामा सूर्यदेव होने से पहले आते होंगे और पूजा करके चले जाते हैं ।

हैरानी की बात यह है कि Asashvattama Kaun tha आखिर तब वह कौन शख्स है। जो मंदिर का ताला खुलने से पहले शिवलिंग की पूजा कर के चला जाता है। जब मंदिर खोला जाता है तो शिवलिंग पर फूल और जल चढ़ा मिलता है तो क्या
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि असीरगढ़ के किले में भी दिन ढलने के बाद किले के मंदिर में किसी को जाने की इजाजत नहीं है ।किले के दरवाजे खिड़कियों में ताले लगाए जाते हैं। जो बाहर से खुलते हैं। और जब उस मंदिर को खोला जाता है तो वहां शिवलिंग पर फूल चढ़ा मिलता है।

इस बात से यकीन करना पड़ता है कि कोई तो है जिसमें देवी शक्ति है जो बिना दरवाजे खुले ही पूजा कर लेता है। वहां के कुछ लोगों का मानना है कि उन्होंने अश्वत्थामा को देखा है। क्योंकि उनके शरीर पर जख्म है, उनके सिर पर जख्म है,और उन जख्मों को भरने के लिए वे औषधि मांगते दिखते हैं।

यह सच है या झूठ पर कुछ तो है, जो हमें सोचने पर मजबूर कर देता है ।

आप क्या सोचते हैं, कमेंट कीजिए।

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