दरोगा शेखचिल्ली नई कहानी | हिंदी मनोरंजक कहानियां

       ।। दरोगा शेख चिल्ली ।।

दरोगा शेखचिल्ली, शेखचिल्ली की मनोरंजक यों के संग्रह से एक और मजेदार कहानी जिसे पढ़कर आप प्रसन्न हों जाएंगे। तो चलिए शुरू करते हैं पढ़ना।  दरोगा शेखचिल्ली    शेखचिल्ली की नई कहानी 

 

एक बार किसी आरोप में शेख को सजा हो गयी। उन्हें जेल भेज दिया गया ।

एक दिन आधी रात को शेख जेल से भागना चाहा अचानक उन्हें एक परछाई दिखाई पड़ी। वे उस समय जेल की दीवार के पीछे से चारदीवारी फांद कर भागना चाह रहे थे।

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तभी उन्हें एक जानी पहचानी आवाज सुनाई पड़ी वह माधव नाम का डाकू था,जो पांच वर्ष की सजा भुगत रहा था। वह भी भागने की तैयारी में था। शेख उसके करीब चले गये।

 

माधव ने कमर से एक रेशमी डोरी का लच्छा निकाला और बोला — तुम इस डोरी को पकड़े रहना ।मैं धीरे-धीरे उस पार उतर जाऊंगा फिर मैं वैसे ही तुम्हें भी जेल से बाहर करवा दूंगा।

शेख ने डोरी पकड़ ली। माधव उतरने लगा। अचानक शेखजी ने सोचा कि जब माधव उतर जायेगा तो मुझे कौन उतारेगा ?

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यह सोचते हुए उन्होंने डोरी छोड़ दी। डोरी छोड़ते ही माधव धड़ाम से जमीन पर आ गिरा। उसके धमाके से सारी पुलिस चौकन्ही हो गई और माधव जख्मी हालत में पकड़ा गया। शेखचिल्ली की नई कहानी

 

शेखजी भी चारदीवारी के समीप आ गए थे। इसलिए उनका बयान लिया गया। शेखजी बोले- मैं एक शरीफ आदमी हूं तथा बेकसूर जेल में पहुंचा दिया गया हूं । करीब एक बजे मैं पेशाब करने के लिए बाहर आया तो देखा कि माधव दीवार पर चढ़ा हुआ है। जब मैंने ऐसा खतरनाक आदमी भागते देखा तो चोरी का कैदी होने के बावजूद भागने मै सहन न कर सका और मैंने एक पत्थर उठाकर माधव को दे मारा।

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पत्थर लगते ही वह दूसरी ओर जा गिरा। उसके बाद जो हुआ आपके सामने है।

पुलिस अफसर ने शेख का बयान सुना और बहुत प्रभावित हुआ। शेखचिल्ली की नई कहानी

उसी समय उन्हें न केवल रिहा कर दिया गया, बल्कि भूत नगर का दरोगा भी बना दिया गया। अब शेख  पुलिस अधिकारी बन चुके थे। उन्हें विश्वास हो गया कि यह यदि आपकी मूर्खता छोड़ कर अकल से जरा भी काम लिया जाये. तो सारे कष्ट दूर हो सकते हैं।

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शेखचिल्ली की नई कहानी जिस दिन शेख  ने भूत नगर थाने का चार्ज लिया उसी दिन माधव डकैत की जेल में मृत्यु हो गई। शेख ने यह समाचार सुनकर इत्मीनान की सांस ली।

 

एक दिन शेख अपने इलाके में गश्त के लिए निकले। उन्हें रास्ते में भूतनगर का गुंडा सरगना ररहीम मिल गया ।

 

रहीम ने शेख जी को हाथ जोड़कर  नमस्ते की और कहा  यदि आप हिंसा की  निति में थोड़ा सा परिवर्तन कर ले तो अच्छा होगा।

 

शेख ने यह सुनते ही रहीम की पीठ पर पूरा चला दिया और बोले – बेवकूफ कहीं का हमको हिंसा और अहिंसा का पाठ पढ़ाने चला है। क्या इतना भी नहीं जानता कि हम दरोगा हैं।

 

दूसरे दिन दरोगा जी ने भूतनगर के महाराज के दरबार में तलब किया गया।

 

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शेख दरबार- में हाजिर हुये और हाथ जोड़कर बोले- सरकार आपने मुझे किसलिए बुलाया है? महाराज ने कहा- तुम्हारे विरुद्ध लोगों की बहुत शिकायतें हैं. तुम शरीफ लोगों को परेशान करते हो।

 

शेखजी ने कहा-  ये मुझ पर झूठा आरोप लगाया गया है। मैं कडा जरूर हूं पर चोरों और बदमाशों के लिये। शरीफ लोगों के लिए तो मैं बिल्कुल नरम और अच्छे स्वभाव वाला हूं।

 

महाराज बोले- यदि ऐसा है तो रहीम के साथ तुमने ऐसा व्यवहार क्यों किया ।

 

शेख ने कहा- वो गुंडों का सरगना है। वह आपके विरुद्ध बगावत करने का षड्यंत्र कर रहा है. वैसे आप कहे तो उसे मनमानी  करने दी जाये।

महाराज ने कहा- अच्छा यह बात है तो फिर तुम जो जी चाहे करो ।

 

शेख ने थाने आने के बाद इलाके में छठे हुए बदमाशों को बुलाया और कहा कि आज रात को सरकारी जंगल में एक बड़ा चंदन का पेड़ काट के रहीम के खेत में डाल दो।

 

बदमाशों ने रातोंरात सरकारी पेड़ काटकर रहीम के खेतों में डाल दिया।

 

सुबह होते ही थाने में रिपोर्ट आई कि सरकारी चंदन का पेड़ चोरी हो गया है। शेखचिल्ली की नई कहानी

 

शेख ने पुलिस को पुलिस की एक टुकड़ी को रहीम के खेत की ओर  भेजा कि जाओ और चोर का पता लगाओ ।

 

थोड़ी देर बाद पता चला कि पेड़ रहीम के खेत में पड़ा है ।

 

उसी समय रहीम को पकड़ लिया गया। उसके लाख सफाई दी । पर कोई उसकी बात को सुनने वाला न था और उसे जेल भेज दिया गया।

 

चंदन का जो पेड़ शेख  ने कटवा डाला था. उस पर भूतों का अड्डा था।

 

एक दिन महाराज राजकाज के कामों में व्यस्त है उन्होंने देखा कि शेख सामने खड़ा मुस्कुरा रहा है। महाराज ने कहा- कहिए दरोगा जी. इस समय आने का क्या कारण है क्या कोई काम है।

शेख ने कहा- बस यूं ही चला आया।

 

महाराज ने कहा- तुम्हें मालूम है इस तरह बिना आज्ञा के राजमहल में आना अपराध है।

शेख ने कहा- अपराधी तुम खुद हो.  जबान संभाल कर बात करो.नहीं तो दिमाग ठिकाने लगा दूंगा।

 

महाराज यह सुनकर क्रोध से थर -थर कांपने लगे जलील बदमाश तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया ।

 

दिमाग तो तुम्हारा खराब है राजन- यह कहकर शेख ठहाका मार कर हंसने लगे।

 

महाराज ने सेनापति को आज्ञा दी कि इस बदतमीज को पकड़ लिया जाये।

 

उसी समय शेख ने छलांग लगाई और कुदकर भाग गये और सेनापति खड़ा देखता रह गया वह दरअसल भूत था जो शेख से बदला लेने के लिए उसकी सूरत बनाकर राजा के पास आया था। राजा ने सेनापति को आदेश दे दिया कि शेख जहां भी मिले उसे कत्ल कर दिया  जाये।

 

  महाराज के पास से होकर भूत एक आदमी की सूरत बना कर शेख की बेगम के पास गया और बोला- शेख ने एक रंडी से शादी कर ली है और तुम्हारी हत्या कराना चाहता है: क्योंकि तुम उसके ऐश में कवाब की हड्डी बन गई हो। तुम फौरन अपनी मां के पास चली जाओ ।

 

यह सुनते ही से की बीवी ने कहा- आपका यह उपकार मैं जीवन भर नहीं भूल सकती।  और फिर वह उसी समय अपने मायके चली गई।

शेख जब इलाके का दौरा समाप्त करके आ रहे थे. तब मार्ग मे उन्हें इस बात की सूचना मिली कि राजा ने उनको मृत्युदंड दिया है।

 

वह जल्दी से अपने घर पहुंचे। वहां देखा तो सन्नाटा था. पड़ोसन ने कहा – तुम्हारी बेगम मायके चली गई है।

 

शेख जी वहां से भागते हुए  अपने एक मित्र के पास पहुंचे जो बड़ा मालदार हो गया था। उसने शेख की कथा सुनी और कहा- अबे चिल्ली तू चिंता ना कर. यहीं रह मजे से खा और मौज कर। शेखजी ने कहा- प्यारे अगर तू ना मिलता तो मैं जरूर आत्महत्या कर लेता।

 

शेख का दुश्मन वह भूत हाथ धोकर पीछे  लगा था ।

 

वह वहां आया और उसने शेख के मित्र का सारा माल शेख के बिस्तर पर लाकर रख दिया ।

फिर एक दिन का कनस्तर जोर से फर्श पर दे मारा।

 

धमाके की आवाज होते ही शेखपुरा की आंख खुल गयी। वह माल को हाथ लगाकर देखने लगा।

 

उधर मित्र ने शेख जी को सारा माल उलते पुलटते तो देखा, तो देखते ही उसके आंखों में खून उतर आया। उसने मोटा- सा डंडा लेकर शेख की खूब पिटाई की और फिर सुबह को उसे गांव वालों के हवाले कर दिया।

 

गांव वालों ने शेख का मुंह काला करके उसे गधे पर बिठाया।

 

और गांव में जुलूस निकाला । पीछे-पीछे कनस्तर बजाते हुए गांव वाले चोर का नारा भी लगाते रहे। पूरा गांव घुमाने के बाद शेख  को छोड़ दिया गया।

 

शेख वहां से आंसू बहाते हुए दूसरे गांव पहुंचे।

वहां पर जमींदार के यहां नौकरी कर ली और वे उसके जानवर चराने लगे।

 

वह भूत अब भी उनके पीछे पड़ा हुआ था। उसने एक रात सब जानवरों को खोल दिया और फिर शेख  को जगाकर कहा- देखो जानवर भागे जा रहे हैं।

 

शेख आंखों आंखें मलता हुआ लाठी लेकर दौड़ा शेख को दौड़ता देख पशुओं ने भागना शुरू कर दिया। उधर भूत में जमीदार से जाकर कहा- उठो शेख तुम्हारे जानवर भगाकर ले जा रहा है। 

 

जमीदार लाठी लेकर दौड़ा और शेख को पीछे से जाकर घेर लिया और बेचारे पर बेहिसाब लाठियां बढ़ने लगी ।

 

शेख लाठी खाकर जमीन पर गिर पड़े और जमीदार अपने पशुओं को लेकर गांव की ओर चल पड़ा।

 

होश आने पर शेख एक शहर में चले गये। सुबह का समय था और अभी बाजार नहीं खुला था। उसी समय एक आदमी उसके पास आया और बोला – मुल्लाजी आप परदेसी दिखते हैं।”

शेख ने  कहां-हां आप ठीक कहते हैं।

 

उस आदमी ने कहा- तो फिर अब शहर में क्या करने का इरादा है?”

 

शेख बोले- इरादा क्या?  सोचता हूं कोई छोटी-मोटी नौकरी कर लू। यदि आप मेरी सहायता करे तो बड़ी कृपा होगी।”

 

उस आदमी ने जेब से चाबी निकालकर शेख को देते हुए कहा-

 

तुम्हारी नौकरी पक्की। यह लो चाबी और सामने वाली दुकान  खोल कर साफ करो। मैं अभी आता हूं।

 

शेख जी ने दुकान खोल कर सफाई शुरू कर दी। उसी समय दुकान का असली मालिक आ गया। पहले वाला आदमी वही भूत था।

 

उसने आते ही शेख  को खूब पीटा और कहा- क्या अपने बाप की दुकान  समझ ली। अभी पुलिस के हवाले करता हूं।

 

पुलिस का नाम सुनते ही शेख सिर पर पांव रख कर भागे। भागते- भागते वह नदी के किनारे पहुंच गये और बेसुध होकर गिर पड़े। उनके मुंह से केवल इतना निकला -“या अल्लाह! अब सहन नहीं होता। या तो अपने पास बुला ले या फिर मुझे जीने का तरीका बता दे।”

 

शेख  इतना ही कह पाए थे कि वही भूत आदमी की शक्ल में वहां आया और बोला- शेखजी आज से तुम्हें कोई नहीं सतायेगा। तुमने अपनी बेवकूफी की वजह से यह तकलीफे उठाई और उसने अपनी सारी कहानी बता दी।

 

शेख बहुत शर्मिंदा हुयेऔर सर झुकाकर बोले-हां यह मेरी गलती थी, क्षमा कर दीजिए। आखिर मै शेख चिल्ली जो ठहरा। मेरे पास अक्ल या बुद्धि नाम की चीज होती तो आज मारा- मारा न फिरता और आदमी तो आदमी तुम जैसे जिन- भूत भी मेरे दुश्मन न बनते।”

 

अब तुम क्या चाहते हो?- भूत बोला ।

शेख बोले- अब तो किसी ऐसे देश में जाने की इच्छा हो रही है जहां को केवल हम जैसे मूर्ख ही रह रहे हो।”

 

भूत ने कहा- मैं तुम्हें वहां पहुंचा देता हूं। तुम आंखें बंद कर लो!”

 

शेख ने मूर्खनगर का नाम सुनकर जल्दी से आखें मुद ली। जब उनकी आंखें खुली तो वह मूर्खनगर पहुंच चुके थे। उन्होंने चैन की सांस ली।

 

इस देश में मूर्खों की खास कदर थी। यह प्रतिवर्ष अच्छे मूर्खों को राष्ट्रीय पुरस्कार दिए जाते थे।

मूर्ख महाविद्यालय से मास्टर आफ मूर्खता एवं डायरेक्टर की उपाधि मिलती थी तथा देश के अच्छे मूर्खों को सम्मानित किया जाता था।।।। 

 

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