शेखचिल्ली की नई कहानी

           ।। शेख और काजी।। 

शेखचिल्ली की नई कहानी दोस्तों इस कहानी का दूसरा भाग अगले post में होगा।इस कहानी में शेखचिल्ली का नया अंदाज देखिए। शेखचिल्ली की नई कहानी 

 

          शेख चिल्ली नौकरी के लिए बहुत परेशान थे। एक दिन उन्हें अपने तीन दोस्त मिले ।

 

         तीनों सगे भाई थे। उनके कान थोड़े-थोड़े कटे हुए थे। शेख  ने पूछा ,” अरे तुम तीनों भाइयों के कान  को क्या हुआ।”

 

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        कुछ मत पूछो  । बड़ा भाई बोला,” एक काजी जी हैं। वे जिसे नौकर रखते हैं पहले यह शर्त करवा लेते हैं कि अगर काम छोड़कर भागोगे तो कान कटवाने पड़ेंगे। अगर वे खुद निकालेंगे तो कान कटवाने को तैयार हैं। हम तीनो भाई बारी-बारी गये। सबको नौकरी छोड़कर भागना पड़ा- और आगे तुम खुद समझ सकते हो।”

कहां रहता है वह? हमें पता बताओ। मुझे नौकरी की तलाश है । शेख जी ने कहा।

 

       उन्होंने काजी का पता तो बता दिया. पर घबराते हुये कहा – यार तुम क्यों कान कटवाना चाहते हो उसके यहां काम करना आसान नहीं है।

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” अच्छा- शेख चिल्ली मुस्कुराते मुस्कुरा कर बोले मैं भी थोड़ा  आजमाना चाहता हूं। कहकर शेख चिल्ली चल पड़े।  वे काजी के पास पहुंचे। काजी ने सवाल किया -तो – तुम नौकरी के लिए आए हो?

जी हां ।

उम्र

नाम शेख चिल्ली

? चौबीस वर्ष छ: महीना ग्यारह दिन और बारह घंटे। काजी चौका  घंटों का हिसाब बता रहा है आदमी चालाक मालूम पड़ता है।

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  हम तुम्हें पचास रूपया और रोटी कपड़ा देंगे। हमारी एक शर्त है। काजी बोले- नौकरी छोड़कर भागने पर कान कटवाना पड़ेगा। मैं खुद नहीं निकाल लूंगा।

हमें मंजूर है । शेख चिल्ली बोले लेकिन यदि आपने हमें  निकाला तो आपको भी कान कटवाने पड़ेंगे। और वर्ष भर की तनख्वाह देनी पड़ेगी। हमारी शर्त मंजूर है?

हमें भी मंजूर है।

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ठीक है। काम समझा दीजिए क्या-क्या करना होगा। हमारी और हमारी बीवी की सेवा– खेती का काम धाम बच्चों की देखभाल वही काम सब जो घरों में होते हैं।

मैं सब कर लूंगा. हुजूर!!

शेख जी नौकरी पर लग गये।

 

रात को जब सोने लगे तो काजी ने आवाज दी अमां मियां शेख जल्दी आओ और बच्चों को नाली पर ले जाकर टट्टी कराओ।

शेख  बच्चे को नाली पर ले आये और बिठाकर बोले- काजी साहब टट्टी के लिए कह  है। पेशाब करने का हुक्म नहीं है। इसलिए बच्चू पेशाब करोगे तो कान उखाड़ लूगा ।

 

बच्चा घबरा गया। वह डर के मारे न टट्टी कर पाया और न पेशाब। वैसे ही उठ गया ।

रात को बेचारे ने दोनों चीजें बिस्तर पर कर दी। जब माता पिता की डांट पड़ी तब बालक ने रोते हुए बताया कि पेशाब नहीं करने दिया और बिना पेशाब करती नहीं आई जोर लगाने पर दोनों साथ आ रहे थे।

काजी समझ गया कि वह चालाक आदमी है। अगले  दिन काजी ने शेख  को पानी गर्म करने के लिए कहा। उसको स्नान करना था।

 

शेख ने काजी के नहाने के लिए पानी गर्म कर दिया । काजी साहब नहाने गये उन्होंने बदन पर पानी डाला और छटपटाकर चीख  पड़े -उल्लू के पट्ठे इतना गर्म क्यों कर दिया पानी को ? आइंदा नहीं करूंगा। शेख ने कहा।

 

काजी ने किसी तरह स्नान किया। काजी की बीवी को भी बहुत गुस्सा आया।

काजी ने शेख को हुक्म दिया -जाओ तालाब के पास वाले टीले से चिकनी मिट्टी ढेले ले आओ। शेख टोकरा लेकर चल पड़े ।

 

थोड़ी देर बाद लौटे तो काजी कचहरी चला गया था। घर पर उनकी बेगम थी । शेख ने पूछा – बेगम साहिबा मिट्टी कहां डालू?

मेरे सिर पर । गुस्से से लाल होकर बेगम बोली। शेख ने इत्मीनान से टोकरा उसके सर पर पलट दिया।  बेगम के सिर में चोट लगने पर चीख पड़ी। उसने शेख को तुरंत नौकरी छोड़कर जाने को कह दिया ।

 

शेख ने मुस्कुरा कर कहा।  मैं बगैर एक साल की तनख्वाह और काजी साहब का कान लिए कैसे जा सकता हूं। बेगम ने सुना तो गुस्सा पी गयी। शाम तक उसने  कोई भी काम  करने के लिए नहीं कहा ।

 

शाम को कचहरी से काजी लौटे तब बेगम ने उसे शिकायत की। उन्होंने शेख को बुलाकर डांटा  शेख चिल्ली! तुमने बदतमीजी क्यों की । क्या किया है मैंने? शेख ने पूछा। तुमने हमारी बेगम के सिर पर मिट्टी का ठेला उलट दिया । इससे मेरी गलती ही क्या है । शेख ने कहा- मैंने बेगम से पूछा था कि मिट्टी कहां डालूं तो उन्होंने कहा कि सिर पर डाल दो ।- तब ही तो मैंने डाला था हुजूर!

 

काजी जी खून का घूंट  पीकर रह गये।

वे न तो उसे निकालने की स्थिति में थे। और न ही रखने की परंतु उसके पास चारा ही क्या था!

 

अगले दिन शेख चिल्ली से काजी साहब ने कहा आज हल- बैल लेकर खेत पर चले जाना और दोपहर तक दस बीघे खेत की जुताई करना। लौटते वक्त चूल्हा जलाने के लिए ईघन और शिकार भी वही से साथ लेते आना । आने पर यदि बेगम तुम्हें घी तो मटके का मुंह खोले बिना पीना ….रोटी दे तो उसे बिना छोटी किए ही खा जाना ।

ठीक है हुजूर।शेख ने कहा शेखचिल्ली की नई कहानी

 

काजी जी ने सोचा कि आज इसे कठिन काम से घबराकर शेख अवश्य  भाग जाएगा। शेख हल बैल लेकर खेत की तरफ चल पड़े। उसने पीके उसके पीछे पीछे काजी की कुतिया भी लग गयी। खेत पर पहुंच कर उन्होंने दो  चार बार दस  बीघे खेत में हल बैल घुमाया और उसके बाद हल को तोड़कर जलवन के रूप में बांध लिया । फिर साथ आई कुतिया को मारकर शिकार के रूप में बांध लिया और मालिक के घर के लिए लौट पड़े। 

 

बेगम ने जब सारा माजरा जान लिया. तो उन्होंने अपना सिर पीटते हुये बोली कुतिया  को ही मार डाला कमीने । अब क्या खायेगा? ले सूखी रोटी खा और खाकर साबुत छोड़ दे। ठीक है लाइए। कहते हुये शेख ने रोटियां थाम ली ।

 

बेगम मन ही मन खुश हो रही थी कि यह असंभव काम न कर पाने के कारण यह यहां से जरूर भाग जाएगा। शेख जी ने रोटियों को बीच में से खा खाकर  चारों ओर एक गोल किनारा छोड़ दिया।

बेगम  भौचक्का हो गई ।

 

फिर बेगम ने घी की छोटी-सी मटकी दी जिसका मुंह ढका हुआ था देती हुई बोली- ले घी पी  और  मत खोल। शेख ने मटकी ले ली और मटकी की पेदी में सुराख करके सारा घी पी लिया।

 

बेगम देखती रह गई । शाम को काजी जी के आने पर उसने सारी बातें सुना दी।

काजी जी कभी सोच भी नहीं सकते थे। कि कभी ऐसे आदमी से पाला पड़ सकता है।

 

काजी जी और उनकी बीवी ने तय किया कि इसे काम कम बताया जाए ताकि नुकसान कम हो।

 

एक दिन घर में अचानक आटा खत्म हो गया तो बेगम में शेखजी से कहा-” घर पर पैसे नहीं है। मैं उनसे लेना भूल गई थी। आटा समाप्त हो चुका है। तुम कचहरी जाकर पैसे ले आओ।

 

शेख चिल्ली कचहरी पहुंचे।वहां सिपाहियों ने उन्हें अंदर जाने से रोक लिया । इस पर वह चिल्ला कर बोले- ” काशी जी के घर पर आता नहीं है और पैसे भी नहीं है- बेगम ने कुछ पैसे मांगने के लिए मुझे भेजा है।

काजी जी सुनकर चौके।उन्हें बहुत गुस्सा आया और बड़ी शर्म भी महसूस हुई।

सिपाही को भी डांटा जिसने उनके नौकर को अंदर नहीं आने दिया था।

 

शाम का काजी ने बेगम को भी डाटा और शेख जी को समझाया भी की जब भी कचहरी में जाकर कोई बात मुझसे कहो तो आहिस्ता से कहो। अब ऐसा ही होगा- शेख चिल्ली बोले।

 

संयोगवश अगले दिन घर में आग लग गई। शेख चिल्ली मोहल्ले के लोगों को खबर किए बिना ही सीधा कचहरी पहुंच गये।

इधर मोहल्ले वाले बेगम और बच्चों का रोना पीटना सुनकर आए और आग बुझाने का प्रयत्न करने लगे।

 

उधर चिल्ली साहब कचहरी गये और धीरे से बोले- घर में आग लग गयी है।

अबे! जोर से बोल कमबख्त सुनाई नहीं पड़ रहा। है घर में आग लग गई है।

सुनते ही का बडबडाये- उल्लू का पट्ठा। और घर की ओर तेजी से भागे । उनके अन्य कर्मचारी भी उनके पीछे पीछे दौड़ पड़े।

 

उन्होंने जाकर आग बुझवाई। उसके बाद शेख पर बरसाते हुए बोले – अरे मूर्ख। घर में आग लग गई थी और तुम वहां धीमी आवाज में बोल रहे थे। हुजूर!आपने ही तो कहा था कि जब भी कचहरी में जाकर कुछ कहूं तो धीरे से कहूं।

 

  सब बातें एक जैसी नहीं होती गधे! आग लगने पर तो सबसे पहले तुम्हें पानी फेंकना शोर मचाना और मिट्टी रेत बगैर फेंकना चाहिये था। आइंदा ऐसा ही होगा।” शेख बोला।

 

अगले दिन काजी ने स्नान के लिए शेख चिल्ली को पानी गर्म करने के लिए कहा।

शेख ने  पानी गर्म कर दिया। और जब काजी ने उसे स्नान करने के लिए कहा. तो एक मग पानी काजी के ऊपर डाल दिया काजी जी चिल्ला पड़े मर गया रे… जला दिया रे… बदन जल रहा है। काजी के चीखते ही शेखजी तुरंत पानी से भरा बाल्टी उनके ऊपर फेकने लगे। मिट्टी और रेट भी डाला ।

 

काजी जी दौडकर कमरे में घुस गये। जब वे ठीक हुये तो शेख को बहुत डांटा। लेकिन  करते क्या? नौकरी से तो नहीं निकाल सकते थे। शेख चिल्ली से काजी और उनकी बेगम दोनों तंग आ चुके थे। लेकिन करें क्या?

 

इसी दौरान काजी साहब को अपनी ससुराल से बुलावा आ गया। काजी ने बेगम के पास दूसरा नौकर छोड़कर शेख को अपने साथ घोड़े पर बिठाए और ससुराल के लिए चल पड़े। उन्होंने शेख को जान-बूझकर अपने साथ ले लिया था। उन्हें लगा कि यह बेगम को परेशान कर देगा।

रास्ते में शाम हो गयी। शेखचिल्ली की नई कहानी

 

घोड़ा शेख चिल्ली को सौपकर  काजी जी शौच करने चले गये। उसी समय वहां कुछ यात्री पहुंचे। वे चोर थे ,पर उनके पास घोड़े तीन ही थे।

 

शेख चिल्ली ने उन्हें रोका और कहा – चार आदमी तीन घोड़े पर जा रहे हो। मेरे पास घोडा है। बोले क्या दोगे इसकी कीमत।

“चार सौ रूपया। चार सौ रुपये लेकर शेख जी ने घोड़ी बेच दी और उनकी थोड़ी सी पूछ काट कर अपने पास रख ली वे लोग घोड़ी लेकर चले गये. तो शेखजी ने एक चूहे के बिल में घोड़ी की दुम घुसेड  दी और शोर मचाने लगे।

 

” काजी जी दौड़कर आइयें घोडी को चूहे  बिल में  खींच ले गये। काजी साहब दौड़कर आये।” मैं दुम पकड़े हुए हू। आप भी मेरा सहयोग कीजिए और पकड़कर बाहर खीचिये। 

 

झटपट काजी जी ने भी दूम पकड़कर खीची तो पीछे की तरफ लुढ़क गये। क्योंकि दुम बिल से बाहर आ गई थी।

 

“यह तो टूट गई काजी साहब : आपने झटके से खींच दी। अब तो घोड़ी के बिल से बाहर निकलने के लिए फावड़े और कई आदमियों की जरूरत पड़ेगी।

 

काजी कुछ सोचते हुये डांटकर बोले- नामुराद! तूने घोड़ी भगा दी या फिर किसी को दे दी। दुम काटकर  मुझे उल्लू बना रहे हो। अब बताओ हम ससुराल कैसे पहुंचेंगे? पैदल तो हफ्ते लग जाएंगे। “अगले शहर या गांव में घोड़ी खरीद लेंगे। इतने बड़े आदमी होकर छोटी बात करते हैं। आप तो बीस घोड़े खरीद सकते हैं।”

 

चलो अब बात मत बनाओ। काजी जी दांत पीसते हुए बोले। वे कर भी क्या सकते थे।

 

और जब वे अगले शहर में आये तो सबसे पहले एक घोड़ा खरीदा। रात को उसी शहर के सराय मे रुके।

अगले दिन वे घोड़े पर बैठकर चल पड़े। काजी जी की ससुराल अभी दूर थी।

रात को शेख चिल्ली को तंग करने के उद्देश्य से काजी ने कहा सारी रात घोड़े की मालिश करते रहो सोना बिल्कुल नहीं।

 

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